वो हंस हंस कर अकसर बातें करते थे
लेकिन कौन जाने कि
क्या वो दिल में दबाए बैठे थे
बगल में छुरी और मुंह
पर राम का नाम जपाते थे
हमें भी एक बार तो ऐसा ही लगा कि सब अपने हैं
अपनों से भला क्या कोई कुछ क्यों छिपाएगा
यही सोच कर हम हर बात हर किसी को बताया करते थे
लेकिन धीरे धीरे ये मीठी छुरियां
हमें ही अपने ज़हरीले डंक से डंस लेगी एक दिन
इस बात का कभी अंदाज़ा न था
