शमिन्दर
कौर कलेर
दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो
कोई भी काम मुश्किल नहीं होता... ये साबित कर दिखाया है कैथल से बीस किलोमीटर की
दूरी पर स्थित गांव नौच की एक महिला ने...
जिसने ज़िंदगी में हार मानना कभी सीखा ही नहीं ... अपनी इसी हिम्मत की बदौलत आज वो
आज अपने पैरों पर खड़ी है और किसी पर बोझ नहीं है ...
सरोज अपने ही गांव के स्कूल
में बनी बचपनशाला में न केवल पढ़ा रही है...बल्कि उन्हें दोपहर के वक्त खाना भी
सर्व करती है...सरोज अपने लिखे शब्दों को जोड़कर जब बच्चों को एबीसीडी लिखना
सिखाती है और बच्चे उसके पीछे पीछे उन शब्दों को जोड़कर बोलते हैं तो उसमें
आत्मविश्वास और भी ज्यादा बढ़ जाता है... ज़िंदगी के झंझावतों से हार न मानने वाली
सरोज किसी के हाथों की मोहताज नहीं है ... और न ही उसने आज तक अपने हाथ किसी के
सामने फैलाए हैं ... बल्कि वो अपना सहारा खुद बन चुकी है ...गांव के ही स्कूल में
बनी बचपनशाला में पढ़ाकर वे अपना और अपने परिवार का गुजर बसर करती है ... सरोज के
साथ जो कुछ हुआ उससे वो कभी भी हताश और निराश नहीं हुई ...बल्कि इन परिस्थितियों
ने उसे और भी ज्यादा मजबूत बना दिया है... सरोज अपनी इस ज़िंदगी से संतुष्ट है और बच्चों
को पढ़ाना उसे बेहद अच्छा लगता है ... सरोज की अब केवल यही इच्छा है कि स्कूल की
जिस बचपनशाला में वो काम कर रही वहीं पर उसे हैल्पर के पद पर स्थाई कर दिया जाए
... अब आपको बतातें हैं कि आखिर सरोज के साथ हुआ क्या था ... कोई वक्त था जब सरोज
भी आम बच्चों की तरह खेलती कूदती थी ... सरोज के मन में भी पढ़ लिख कर बड़ा अफसर
बनने की चाह थी ... उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक हादसा उसकी ज़िंदगी
को ही बदल कर रख देगा... सरोज एक दिन अपने भाई के साथ चारा काटने वाली मशीन में
चारा काट रही थी ...लेकिन उसी दौरान उसके दोनों हाथ कट गए ...सरोज ने खुद को बचाने
की बड़ी कोशिश की लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था ... इस हादसे में उसने
अपने दोनों हाथ गंवा दिए ... जिसके बाद सरोज को रोजमर्रा के कामकाज में काफी
दिक्कत महसूस होने लगी...लेकिन खुद के जज्बे और परिवार वालों की हिम्मत की बदौलत
उसने फिर से स्कूल जाना शुरू कर दिया ...और दसवीं तक शिक्षा हासिल की ...जिसके बाद
इसी स्कूल में उसने हैल्पर के तौर पर नौकरी शुरू कर दी ... सरोज को महज पंद्रह सोै
रूपये मेहनताना मिलता है ...सरोज की इस हिम्मत के स्कूल में कार्यरत अन्य अध्यापक
भी कायल हैं... और सरकार से सरोज के लिए मदद की मांग कर रहे हैं... क्योंकि नियमित
नौकरी करने वालों को 3500 रूपये दिए जाते हैं ...जबकि सरोज को
महज़ 1500 रूपये ही मिलते हैं...सरोज हाथ न होते
हुए भी आज आत्मनिर्भर है...उसने कठिन परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी
...यही वजह है कि वो आज किसी के आगे हाथ फैलाने को मजबूर नहीं है...वहीं सरोज उन
लोगों के लिए एक मिसाल बन चुकी है ...जो कठिन हालातों का सामना करने की बजाए उनके
आगे घुटने टेक देते हैं...
सच कहा आपने कुछ करने का जजबा इंसान को कभी हारने नहीं देता
जवाब देंहटाएंसच कहा आपने कुछ करने का जजबा इंसान को कभी हारने नहीं देता
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