गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

दोमुंहों से ज़रा बचकर .........





वो हंस हंस कर अकसर बातें करते थे
 लेकिन कौन जाने कि क्या वो दिल में दबाए बैठे थे
 बगल में छुरी और मुंह पर राम का नाम जपाते थे
हमें भी एक बार तो ऐसा ही लगा कि सब अपने हैं
अपनों से भला क्या ​कोई कुछ क्यों ​छिपाएगा
यही सोच कर हम हर बात हर किसी को बताया करते थे
लेकिन धीरे धीरे ये मीठी छुरियां
हमें ही अपने ज़हरीले डंक से डंस लेगी एक दिन
इस बात का कभी अंदाज़ा न था

लेकिन हां एक बात का यकीं तो हो गया है
एक नसीहत भी मिल गई है ज़िदंगी से
जो जितना मीठा होता है ...उसके ज़हन में उतनी ज्यादा होती है ज़हर
उपर से तो आपको अपना होने का अहसास कराते है
लेकिन मौका मिलने पर कभी भी डंसने से बाज़ नहीं आते हैं
ये चंद लाइनें हैं उन मौकाप्रस्त लोगों के लिए
जो कामयाबी पाने के लिए किसी भी हद से गुज़र जाते हैं
अपना ज़मीर बेच कर चंद कागज़ के टुकड़ों के लिए
अपना धर्म,ईमान सब कुछ बेच जाते हैं
एक नसीहत तो मिली है शमिन्दर तुझे कि जो ज्यादा अपना बनने का दावा करते हैं
हकीकत में वहीं तो जड़ें काट कर अपनी जगह बनाते हैं




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