फरीदा खाक न निंदिये ,खाक जेड न कोई
बाबा फरीद साहिब ने अपनी वाणी में पूरी इंसानियत को अहंकार,निंदा और चुगली से बचने का संदेश दिया ...उनकी वाणी का एक एक शब्द उस परमात्मा की महिमा करती है...आज हम आपको बाबा फरीद जी के बारे में जानकारी देंगे...बाबा फरीद जी का पूरा नाम फरीद मसउद शकरगंज था...उनका जन्म 1172 में पाकिस्तान के मुलतान के गांव खोतवाल में हुआ था...उनके पिता का नाम शेख जमान सुलेमान और माता का नाम मरीयम था ...उनकी मां बहुत ही धार्मिक प्रवृति की थीं उनकी शिक्षाओं का असर बाबा जी पर बहुत था ...यही वजह थी कि बाबा फरीद साहिब बारह वर्ष की आयु में ही कुरान मजीद का अध्ययन कर गए थे ...कहा जाता है कि वे मौखिक रूप से भी इसे याद कर चुके थे ...शेख फरीद जी के पूर्वज महमूद गजनवी से संंबंध रखते थे ...उनके पिता गजनवी के भतीजे थे ...सुलेमान पहले हिंद आ गए और फिर वहां से लाहौर आ गए ...वे बहुत ही धार्मिक प्रवृति के थे ...उन्होंने पाकपटन में अपना ठिकाना बना लिया ,यहीं पर शेख फरीद जी का जन्म हुआ ...उनका जन्म पहली पातशाही साहिब श्री गुरु नानक देव जी के जन्म से करीब सौ साल पहले का माना जाता है ...बाबा फरीद जी के माता जो कि बहुत ही धार्मिक विचारों वाले थे उन्होंने एक दिन फरीद साहिब को परमात्मा की भक्ति से जुडने के लिए कहा...उसके बाद शेख फरीद जी के मन में परमात्मा की भक्ति का प्यार पैदा हुआ और वो परमात्मा की भक्ति के लिए घर से निकल पडे ...उन्होंने बारह साल तक जंगल में रह कर भक्ति की ...इस दौरान न तो उन्हें गर्मी सर्दी का ख्याल रहता और न ही बारिश का ...हर वक्त परमात्मा की भक्ति से जुडे रहने के कारण उनके बाल जुड गए थे ...बारह साल तक तप करते करते उनके मन में अहंकार आ गया था और एक दिन उनके मन में परमात्मा को परखने का ख्याल आया ...उन्होंने चिढियों को कहा मर जाओ और चिढियां मर गईं ...फिर उन्होंने कहा कि चिढियो मर जाओ तो चिढियां जीवित हो गई ...इस के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अब उनकी भक्ति पूर्ण हो चुकी है और वो घर की तरफ रवाना हो गए ! रास्ते में जब वे घर वापिस आ रहे थे तो रास्ते में उन्हें प्यास लगी तो रास्ते में एक कुंए के पास एक लड़की पानी कुंए से निकालती और डोलची में भरे पानी को बाहर फेंक देती ...फरीद साहिब ने उस लड़की को पानी पिलाने के लिए कहा ...लेकिन उसने फरीद साहिब की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और अपना काम करती रही ...वो पानी निकालती और बाहर बहा देती ...फरीद साहिब को गुस्सा आया और वो कहने लगे कि मैं तुम्हें कब से कह रहा हूं कि मुझे पानी पिला दो तुम मुझे पानी की बजाए पानी व्यर्थ में बहा रही हो ...इस पर उस लड़की ने जवाब दिया कि मेरी बहन के घर में आग लग गई है उसे बुझा रही हूं जो यहां से कुछ ही मील की दूरी पर है ...बाबा फरीद जी ये बात सुनकर बहुत हैरान हुए और इसके बाद वो लडकी फिर से बोली यहां पर ये नहीं कि चिढ़ियो मर जाओ और चिढ़ियां मर जाएंगी...बाबा फरीद साहिब हैरानी के साथ उस लड़की की तरफ देखने लगे ...उन्होंने उस लड़की से अर्ज की कि तुम भले ही मुझे पानी पिलाओ या न ,लेकिन मुझे ये बता दो कि ये बात तुम्हें कैसे पता चली ...लड़की ने जवाब दिया कि मैं सेवा और अपने पति को प्रेम करती हूं लेकिन मैंने इस तपस्या और सेवा का कभी भी अहंकार नहीं किया ...आपने तो परमात्मा की परीक्षा ली है ...उसको आजमा कर आपने उस परमात्मा पर संदेह जताया है जो कि बिल्कुल भी उचित नहीं है ...थोड़ी देर फरीद साहिब देखते हैं कि उस जगह पर न तो कोई लड़की है न कुआं और न ही डोलची क्योंकि परमात्मा ने ये चमत्कार खुद ही रचा था ... उन्हें समझाने के लिए ...बाबा फरीद जी घर पहुंचे तो उनकी माता ने फरीद साहिब के जुड़ चुके बाल संवारने शुरू कर दिए ...उन्हें बहुत तकलीफ महसूस हुई ...इस पर उनकी माता ने कहा कि जिन वृक्षों के फल और फूल तोड़ कर खाए थे क्या उन्हें तकलीफ नहीं हुई थी ...इसी तरह यदि किसी को दुख देते हैं तो खुद भी दुख उठाना पड़ता है ...उन्होंने कहा कि हर जीव में परमात्मा का नूर हैं और चाहे वे कोई परिंदा है या फिर इंसान ...इसके बाद फरीद साहिब को महसूस हुआ कि उनकी भक्ति अधूरी है और उनके मन में फिर से परमात्मा की भक्ति का ख्याल आया ...उन्होंने अपना घर छोड़ दिया थ और वे न तो पेड़ों से कुछ तोड़कर खाते थे नीचे गिरी हुई वस्तु ही खाकर अपना पेट भरते थे ...भक्ति करते करते कई साल बीत गए और उनकी काया बहुत ही कमजोर हो चुकी थी ...मन में प्रभु दर्शन की अभिलाषा थी पर परमात्मा के दर्शन नहीं थे ..उनके मन की अवस्था उनके एक श्लोक में होती है ...
